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शिव कुमार बटालवी: कोई कलाकार एक तारीख़ के साथ पैदा तो होता है लेकिन एक तारीख़ के साथ उसकी मृत्यु नहीं होती

shiv kumar batalvi famous punjabi poet
                
                                                                                 
                            कोई कलाकार एक तारीख़ के साथ पैदा तो होता है लेकिन एक तारीख़ के साथ उसकी मृत्यु नहीं होती। देह के बाद उसकी रचनाएं यात्रा करती हैं। शिव बटालवी उन्हीं चुनिंदा कवियों में से एक हैं जो देह के पार अपने गीतों के ज़रिेये मौजूद हैं। शिव और भी विशेष इसलिए हैं कि वह भाषा की सीमाओं को पार कर मन में जगह बनाते हैं। उन्होंने अपने बारे में कहा था कि जितनी मोहब्बत उन्हें मिली पंजाब के किसी शायर को नहीं मिली, वे ठीक कहते हैं। शिव भाषा की सीमाओं को पार कर हिंदी भाषियों की रील्स और फेसबुक वॉल कर मशहूर हैं, इसमें फ़िल्मी गीतों के योगदान के साथ उन तमाम ग़ज़ल गायकों का भी हिस्सा है जिन्होंने शिव के गीतों को स्वरबद्ध किया है। यहां एक ज़िक्र ज़रूरी है कि शिव ख़ुद भी बेहद सुंदर गाते थे, की पुछदेओ हाल फ़कीरां के अलावा भी कई गीत हैं जो उनकी आवाज़ में यूट्यूब पर हैं। 
                                                                                                


एक बात कि शिव की रचनाएं प्रेम और बिरह तक ही सीमित कर दी गईं जबकि उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर भी लिखा चाहें जनसंख्या हो या चीन। जितने पोस्ट दिखाई देते हैं वे उन्हीं गिने-चुने गीतों और कविताओं के होते हैं, इसकी एक मुख्य वजह वही है जिसका अक्सर ज़िक्र भी होता है कि उनका काम अभी तक हिंदी में नहीं आया। शिव के एक मित्र के बेटे से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि शिव कहा करते थे, उनका काम अगले 500 साल तक भी हिंदी में नहीं आ पाएगा। ठीक ही है चूंकि आज तक शिव के जो अनुवाद हुए भी उनमें वह तरंग महसूस नहीं होती जो उनके मूल गीतों में है। शिव के अनुवाद के लिए वैसा ही ज़हन चाहिए। वह मासूमियत जो प्रेमिका से अलग होने पर रो दे और वह ह्रदय जिसमें प्रेम के सिवा और कुछ न हो। इस अनुवाद के लिए शायद अभी और इंतज़ार बाक़ी है। उनके प्रशंसकों के पास सिवा इसके और संग्रहित करने को कुछ है भी नहीं। 

शिव के कुछ क़िस्से उनके समकालीनों की किताबों में मिलते ज़रूर हैं लेकिन वास्तव में उनकी रचनाओं के ज़रिए ही उन्हें जाना जा सकता है। लूणा के लिए सबसे कम उम्र में साहित्य अकादमी पाने वाला कवि जिसे कम उम्र में चले जाने की जल्दी थी। लेकिन फिर दोहराती हूं कि कलाकार की मृत्यु नहीं होती, देह के बाद उसकी रचनाएं यात्रा करती हैं। एक ग़ज़ल है जो शिव के नाम लिखी है 

बस अब दुनिया से पर्दा चाहती हूँ
मैं सब से दूर रहना चाहती हूँ

सितारों की तरह या गुल के जैसे
जवानी में ही मरना चाहती हूँ

वो एक तस्वीर जो बनती नहीं है
उसी में रंग भरना चाहती हूँ

किताबों को उठा कर गोद में यूँ
मैं कोई शे'र कहना चाहती हूँ

मुझे भी इल्म है दुनिया का सारा
मैं धीमी मौत मरना चाहती हूँ  

3 months ago

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