फ़्रांज़ काफ़्का की कहानी ‘संकल्प’

franz kafka short story sankalp
                
                                                             
                            यदि तुम्हें स्वयं को ख़राब मन:स्थिति से बाहर लाना है तो इसे मजबूत इच्छा-शक्ति द्वारा करना होगा। मैं जबर करके कुर्सी से उठा, टेबल के चारों ओर चक्कर लगाया, सिर एवं गले का व्यायाम किया, आंखों में चमक लाई तथा चारों ओर की मांसपेशियों को सख़्त किया। अपनी भावनाओं की परवाह न करते हुए पूरे उत्साह के साथ ‘क’ का स्वागत करता हूं, यह मानकर कि यह मुझसे मिलने आया है तथा प्यार से ‘ब’ को अपने कमरे में बर्दाश्त करता हूं, सबकुछ भूलकर जो उसके ‘द’ के कमरे में कहा था, चाहे मुझे कितनी भी पीड़ा या परेशानी हो।
                                                                     
                            
 
फिर भी मैं किसी तरह सब कुछ कर लेता हूं, फिर भी एक चूक, सिर्फ़ एक चूक, जिसकी संभावना रहती है, वह पूरी प्रक्रिया को ही रोक देगी, जो सरल एवं पीड़ादायक है और यह मुझे एक बार फिर अपने घेरे में वापिस भेज देगी।
 
इसलिए श्रेष्ठ तरीका यह है कि हर चीज़ की निष्क्रियता से सामना करो, ताकि स्वयं को एक निष्क्रिय प्राणी बना सको, लेकिन यदि तुम्हें लगता है कि आवेश में बहते जा रहे हो, तो स्वयं को एक ही कदम उठाने से रोको। अपने ही हाथों से अपने भीतर शेष रह गए पैशाचिक जीवन का अंत कर दो, ताकि कब्र की अंतिम शांति की विस्तार कर सको और उसके बाद उसके सिवा कुछ और न बचे।

अपनी कनिष्ठ उंगली को अपने भवों पर फेरना इस दिशा में होने वाली एक विशिष्ट क्रिया है।
 
1 month ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X