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मुड़ मुड़ के देखता हूं

न्याय की लड़ाई ने मुझे लेखिका बनाया...

गोदावरी पारुलेकर

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मैं पुणे में पैदा हुई। मेरे वकील पिता लक्ष्मणराव गोखले प्रसिद्ध
कांग्रेसी नेता गोपालकृष्ण गोखले के मौसेरे भाई थे। बचपन से ही मुझमें यह
भावना पैदा हो चुकी थी कि अन्याय के आगे झुकना नहीं है। फर्गुसन कॉलेज से
स्नातक करने के बाद मैंने कानून की पढ़ाई की। महाराष्ट्र में लॉ ग्रेजुएट
होने वाली मैं पहली लड़की थी। कॉलेज में ही मैं ब्रिटिशों के खिलाफ आंदोलन
में सक्रिय हो गई थी और सत्याग्रह में भाग ले चुकी थी। लेकिन मेरे परिवार
वालों को मेरा इस तरह सड़क पर उतरना अच्छा नहीं लगा। इस पर मैंने घर छोड़
दिया और सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी से जुड़ गई। फिर मैं किसान-मजदूरों के
हित में अभियान चलाने लगी। इस दौरान कई बार मुझे जेल जाना पड़ा। शादी के
कुछ साल बाद पति के साथ मैंने कम्युनिस्ट पार्टी जॉइन कर ली। पति की मृत्यु
के बाद मैं ऑल इंडिया किसान महासभा की पहली महिला प्रमुख बनी। उसी समय मैं
वारली समुदाय की समस्याओं से अवगत हुई, जिन्हें जमींदारों के शोषण का सामना
करना पड़ता था। वारली महिलाओं को न केवल जमींदारों के यौन शोषण का सामना
करना पड़ता था, बल्कि डायन बताकर उनकी हत्या कर दी जाती थी। यह सब जानकर
मेरी रूह कांप गई। इस तरह आजादी की मेरी लड़ाई सिर्फ ब्रिटिशों के खिलाफ
नहीं, बल्कि शोषक जमींदारों के विरुद्ध भी थी। मैंने इन तमाम संघर्षों के
बारे में अपनी किताब, जेहवा मानुष जगा होतो में लिखा है, जिसे साहित्य
अकादेमी पुरस्कार के अलावा सोवियत लैंड अवार्ड मिला और जिसका कई भाषाओं में
अनुवाद हुआ। बंदीवर्षाचि आठ वर्ष मेरी दूसरी किताब है, जो मेरी जेल
यात्राओं और साथी महिला कैदियों पर आधारित है।

-चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका
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