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world urdu day ye kaisa ishq hai urdu zubaan ka

मुड़ मुड़ के देखता हूं

विश्व उर्दू दिवस - ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का मज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है 
वो शख़्स मोहज़्ज़ब है जिस को ये ज़ुबाँ आई 


रविश सिद्दीक़ी का यह शेर उर्दू ज़ुबां की तारीफ़ में लिखा गया है और सच भी है क्योंकि इस भाषा की तासीर ऐसी है कि इससे तआरुफ़ रखने वाले के पास अगर कोई अकादमिक इल्म ना भी हो तब भी वह मोहज़्ज़ब यानि तालीमयाफ़्ता ही कहा जाता है। इस ज़ुबान की ख़ूबसूरती का आलम यह है कि दो लफ़्ज़ ग़र किसी अंधेरे कमरे में गूंज जाएं तो फ़ानूस की शमां सी रौशनी हो जाए।  आगे पढ़ें

ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का...

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