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ख़ुमार बाराबंकवी

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जब ‘ख़ुमार’ ने एक साहिबा के लिए कहा, ‘सारा रोमांस ख़त्म हो गया’

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यह किस्सा वाणी प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘चेहरे’ से लिया गया है। निदा फ़ाज़ली लिखते हैं कि

अरब अमीरेट के दुबई के होटल ‘काज़ाब्लांका’ में ‘ख़ुमार’ साहिब और मैं एक ही कमरे में थे। सुबह के ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे होंगे कि कमरे की घंटी बजी और एक बड़ी उम्र की औरत लगभग ‘ख़ुमार’ साहिब की उम्र की, बड़ा सा गुलदस्ता लिये अंदर दाखिल हुईं। वह ‘ख़ुमार’ साहिब से मिलने आयी थीं। ‘ख़ुमार’ आंखों पर चश्मा रखकर उन्हें अभी पहचानने की कोशिश ही कर रहे थे कि वह बड़ी बी बोल पड़ी। “मैं जानती थी आपको मैं याद नहीं आऊंगी, याद दिलाना पड़ेगा”, और फिर वह याद दिलाने लगी।

“अच्छा यह बताइये जिस कतअ में आख़िरी मिसरा है- पसीने-पसीने हुए जा रहे हैं” वह किसके बार में था? इतना सुनते ही ख़ुमार साहब खड़े हो गये और हैरत से उन्हें देखने लगे और उसके बाद पचास साल पहले का बाराबंकी, वहां की गलियां, इमामबाड़े की मजलिसें, कॉलेज की ताक-झांक, दूर-दूर की मुलाक़ातें सब चंद लम्हों में कमरे में चारों तरफ़ बिखर गयीं। ‘ख़ुमार’ का शेर है


‘कहानी मेरे ही गुज़रे हुए लम्हाते-रगीं की
मुझी को अब हदीसे दीगरां मालूम होती हैं’
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वह मोहतरमा...

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