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shri kant verma indira gandhi in ghalib chhuti sharab

मुड़ मुड़ के देखता हूं

इन्दिरा जी उन्हें पसंद करती थीं और वह उन्हें राज्यसभा ले गयी थीं मगर...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हिंदी कविता के मूर्धन्य हस्ताक्षर श्रीकान्त वर्मा अपने लेखन में जितना दबंग और आक्रामक लगते थे, उनसे मिलकर विपरीत प्रभाव पड़ता था। रवीन्द्र कालिया अपनी किताब ग़ालिब छुटी शराब में लिखते हैं कि “मैंने उन्हें हमेशा अत्यन्त संकोचशील, दब्बू और विनम्र ही पाया। उत्तेजित होते तो बच्चों की तरह उनके गाल सुर्ख़ हो जाते। उनकी रचना में उनका जो तेवर नज़र आता, वह मिलने पर दूर-दूर तक दिखायी न देता। अक्सर वह अपने से ही जूझते दिखायी देते।
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