इन्दिरा जी उन्हें पसंद करती थीं और वह उन्हें राज्यसभा ले गयी थीं मगर...

shri kant verma indira gandhi in ghalib chhuti sharab
                
                                                             
                            
हिंदी कविता के मूर्धन्य हस्ताक्षर श्रीकान्त वर्मा अपने लेखन में जितना दबंग और आक्रामक लगते थे, उनसे मिलकर विपरीत प्रभाव पड़ता था। रवीन्द्र कालिया अपनी किताब ग़ालिब छुटी शराब में लिखते हैं कि “मैंने उन्हें हमेशा अत्यन्त संकोचशील, दब्बू और विनम्र ही पाया। उत्तेजित होते तो बच्चों की तरह उनके गाल सुर्ख़ हो जाते। उनकी रचना में उनका जो तेवर नज़र आता, वह मिलने पर दूर-दूर तक दिखायी न देता। अक्सर वह अपने से ही जूझते दिखायी देते।
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1 year ago

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