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Shayar Shifa gwaliori - kaif bhopali

मुड़ मुड़ के देखता हूं

लेटे हुए रोगी को कराहता छोड़ ‘शिफ़ा’ अपना काव्य-संग्रह भेंट करने लगे…

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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शायर शिफ़ा ग्वालियरी साहिब डॉक्टर, कम्पाउंडर, शाइर और मालिक सभी कुछ थे। उनके दवाखाने के सामने थोड़ी दूर पर एक साथ कई तांगे खड़े होते थे, जिनमें जुते घोड़े अपनी थैलियों में मुँह डाले घास खाते रहते थे और तांगे वाले नीचे बैठे ताश खेलते थे और बात-बात पर कहकहे लगाते थे। यह शिफ़ा क्लीनिक बेफ़िक्र शाइरों का अड्डा भी था। उनके इस क्लीनिक में रोगी कम आते थे, नये

शाइर अपना कलाम अधिक सुनाते थे। अगर किसी की ग़ज़ल सुनाने के दौरान रोगी भी आ जाता था तो उससे इशारे से ग़ज़ल के पूरी होने तक प्रतीक्षा करने को कहा जाता था। यहाँ अक्सर शाइर एवं साहित्यकार चाय पीने, पान खाने और गपशप लड़ाने भी आते थे । वाक्यों का प्रहार एवं परोक्ष कटाक्ष यहाँ का दैनिक माहौल था। शहर भर की साहित्यिक ख़बरों का यह ऐसा अख़बार था जो मौखिक लिखा जाता था और कानों से सुना जाता था। यहाँ से ख़बरें निकलकर परे शहर में गश्त करती थीं।

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