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शारदा राजन

मुड़ मुड़ के देखता हूं

तितली उड़ी, उड़ जो चली ! मेरा दिल मचल गया, उन्हें देखा और बदल गया

शारदा राजन आयंगर, मशहूर पार्श्व गायिका

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मेरा परिवार तमिलनाडु से है। मेरा बचपन भी वहीं गुजरा है। फिल्म देखना तो दूर, हमें तो तमिल गाने भी सुनने की इजाजत नहीं थी, लेकिन रेडियो पर प्रसारित हिंदी गाने मुझे बहुत असरदार लगते थे। मैं उन्हें तमिल में लिख लेती थी और अकेले में गुनगुनाया करती थी।

इस तरह हिंदी गानों को लेकर मेरी दीवानगी बढ़ती गई। फिर मेरा परिवार तेहरान चला गया। वहां अक्सर जिन पार्टियों में भारतीय आते थे, मैं वहां हिंदी फिल्मों के गीत गाया करती थी। फिल्मों के बहुत बड़े वितरक श्रीचंद हिंदुजा उन दिनों तेहरान में थे, जब राजकपूर साहब वहां आए थे। राज साहब के लिए एक पार्टी आयोजित की गई और मुझे उसमें गाने के लिए आमंत्रित किया गया। राज साहब ने गाना सुना, तो बोले तुम्हारी आवाज बहुत अच्छी है। कभी मुंबई आना, तो मुझसे मिलना।

कुछ समय बाद जब मैं मुंबई पहुंची, तो यह जानकर मुझे खुशी का ठिकाना न रहा कि राज कपूर उन्हें भूले नहीं थे। राजकपूर साहब को अपना वादा याद था। उन्होंने कहा कि अगर वाॅयस टेस्ट में तुम्हारी आवाज ठीक निकली, तो तुम्हें  फिल्मों में गाने का मौका दूंगा। राज साहब ने कहा कि तुम शंकर जयकिशन के पास जाओ, वो हमारे म्यूजिक डायरेक्टर हैं। शंकर जयकिशन जी तब फेमस स्टूडियो में बैठा करते थे। मैं शंकर जी से मिली। उन्होंने मुझसे गाना सुना और कहा कि अभी आपको ट्रेनिंग की जरूरत है।

शंकर जी ने ही मेरी ट्रेनिंग की व्यवस्था की। गुरु जगन्नाथ प्रसाद जी से मुझे संगीत की तालीम दिलाई। उन्होंने ही मुकेश जी को भी संगीत की तालीम दी थी। इसके बाद शंकर साहब ने निर्मला जी से मुझे लाइट म्यूजिक सिखवाया। शंकर जी मुझे नियमित रूप से स्टूडियो में बुलाया करते थे। मैं वहां गानों की रिहर्सल सुना करती थी। फिर उन गानों को मैं खुद गाकर भी प्रैक्टिस करती थी। इससे मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला। फिर वह मौका भी आया, जब शंकर जयकिशन के संगीत में मैंने फिल्म ‘सूरज’ के लिए ‘तितली उड़ी, उड़ जो चली’ रिकाॅर्ड कराया। ‘सूरज’ के गानों की शोहरत ने मुझे रातों-रात स्टार बना दिया।  

इसी फिल्म का एक और गाना बहुत पसंद किया गया- ‘देखो मेरा दिल मचल गया, उन्हें देखा और...।’ उस साल फिल्मफेयर अवाॅर्ड के लिए ‘तिलती उड़ी...’ और रफी साहब के गाए गीत ‘बहारों फूल बरसाओ...’ को बराबर-बराबर वोट मिले। अवाॅर्ड तो रफी साहब को मिला, लेकिन मुझे स्पेशल अवाॅर्ड दिया गया। शंकर जी का मेरी आवाज और मेरी मेहनत पर भरोसा बढ़ता गया। ‘गुमनाम’, ‘अराउंड द वर्ल्ड’, ‘शतरंज’ जैसी फिल्मों में शंकर जी ने ही मुझे मौके दिए। मैंने भी शंकर जी का भरोसा टूटने नहीं दिया। महज 20 गीत गाने के बाद फिल्म ‘जहां प्यार मिले’ के गीत ‘बात जरा है आपस की...’ के लिए फिल्मफेयर अवाॅर्ड  हासिल किया।  

लेकिन मेरी इस सफलता को लेकर फिल्म इंडस्ट्री के लोगों को समस्याएं भी शुरू हो गईं। मेरी आलोचना की जाने लगी कि शारदा की आवाज अनगढ़ और बच्चों जैसी है। उस समय शंकर जयकिशन की जोड़ी का फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा दबदबा था कि कोई खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करता था, लेकिन पर्दे के पीछ से मेरे खिलाफ षड्यंत्र शुरू हो गए। शंकर जी ने किसी की भी परवाह न करते हुए मेरा साथ दिया। उन्हें मेरा गुरु, गॉडफादर या संरक्षक, जो भी समझ लीजिए, लेकिन गुमनाम शारदा को शोहरत उनकी बदौलत ही मिली।

हर आदमी का समय होता है। शंकर जयकिशन की जोड़ी का समय धीरे-धीरे खत्म होने लगा। फिर मुझेे उषा खन्ना, रवि जी जैसे दो-तीन संगीतकारों को छोड़कर किसी ने मौका नहीं दिया। फिर भी शंकर जी ने मेरी आवाज को लेकर प्रयोग करना जारी रखा।  फिल्म ‘सीमा’ में रफी साहब के गाए गीत ‘जब भी ये दिल उदास होता है...’ में मेरी आवाज को केवल हमिंग के तौर पर शामिल किया, जिससे आभास हो कि कोई ख्यालों में गुनगुना रहा है। यह प्रयोग सफल रहा।

शंकर जी मुझसे कहते रहते थे कि तुम हार मत मानना। गाने के मौके कम हुए, तो मैंने फिल्मों में संगीत देना शुरू कर दिया। साल 1987 में जब शंकर जी का निधन हुआ, तो मैं बहुत मायूस हो गई, लेकिन शंकर जी के जिस भरोसे ने मुझे गायिका के रूप में स्थापित किया, उसी भरोसे के दम पर आज भी लोग शारदा को भूले नहीं हैं। मैं जब भी देश-विदेश के किसी प्रोग्राम में जाती हूं, तो मुझसे ‘तितली उड़ी...’ सुनाने की फरमाइश जरूर होती है।       

(इकबाल रिजवी से बातचीत पर आधारित)
 
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