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मुड़ मुड़ के देखता हूं

सज्जाद हुसैन: वो तो चले गए...ऐ दिल उनकी याद से प्यार कर

रघुवीर सिंह, अमर उजाला काव्य 

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अरबी शैली के संगीत के टुकड़ों से अपनी धुनें सजाने में माहिर सज्जाद हुसैन ने लगातार प्रयोग  किए। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के व्याकरण से चुनकर राग-रागनियों के स्वरों का इस्तेमाल भी उनका पसंदीदा काम रहा।

1956 की बात है। कोलकाता में अखिल भारतीय शास्त्रीय संगीत सम्मेलन चल रहा था। मैंडोलिन पर सज्जाद हुसैन थे। सम्मेलन में शिरकत कर रहे बाबा अलाउद्दीन खान, बड़े गुलाम अली खान, विनायक राव पटवर्धन, अहमद जान थिरकवा, निखिल बनर्जी और अली अकबर खान जैसे दिग्गज थे। माना जाता था कि मैंडोलिन में ‘मींड़’ का प्रभाव लाना नामुमकिन है, लेकिन सज्जाद ने मैंडोलिन से ‘मींड़’का असर पैदा कर लोगों को अचंभित कर दिया। इम्तिहान लेने के लिए बड़े गुलाम अली खान ने एक मुश्किल लड़ीदार तान अपने गले से निकाली, तो सज्जाद ने उसे मैंडोलिन पर ज्यों की त्यों उतार कर महफिल लूट ली।  आगे पढ़ें

सज्जाद हुसैन ने संगीत पिता मुहम्मद अमीर खान से सितार वादन के रूप में सीखा।

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