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nirmal verma a writer of psyche

मुड़ मुड़ के देखता हूं

"निर्मल जीवन के लेखक नहीं हैं वह मन के ज्योतिषी हैं"

दीपाली अग्रवाल

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किताबें किसी रेल के समान हैं जिनमें बैठकर कोई पाठक यात्रा करता है। लेखक का दायित्व है कि उसका पाठक किसी स्टेशन पर चेन खींच कर उतर न जाए। यहाँ निर्मल ऐसे हैं जो अनिवार्य रूप से आपको अंत तक पहुँचा ही देते हैं। निर्मल की रेल यात्रा सुगम नहीं है। वह सदैव पहाड़ों से होकर गुज़रती है देवदार और चीड़ के वृक्षों के मध्य। फिर मन की ऐसी सुरंग में ले जाती है जहाँ आप विस्मय से सोचते हैं कि अपने भीतर इतना गहरा हिस्सा भी रहता है। अक्सर रेल किसी बीहड़ के पास लैम्पपोस्ट के नीचे खड़ी रहती है तो कभी ‘चहबच्चों’ के बीच से गुज़रती है, कितने ‘गढ़हों’ को पार करते हुए। आगे पढ़ें

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