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Majrooh Sultanpuri never thought that he became lyricist

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जिगर मुरादाबादी को उस्ताद मानते थे इश्क़ के हकीम मजरूह सुल्तानपुरी

अकरम रज़ा हिंदी / अमर उजाला काव्य, नई दिल्ली

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'चुरा लिया है तुम ने जो दिल को, नज़र नहीं चुराना सनम
बदल के  मेरी  तुम ज़िंदगानी, कहीं बदल न  जाना सनम'


इस मशहूर गीत को क़लमबंद करने वाले मजरूह सुल्तानपुरी को इस बात का इल्म नहीं था कि वो एक दिन गीतकार बनेंगे। उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद के पास एक क़स्बे में हकीमी करने वाले मजरूह मरीरज़ों की नब्ज़ देख कर दवाइयां दिया करते थे। लेकिन, जब उन्होंने इश्क़ का हकीम होने का यानी की मुकम्मल शायर होने का फैसला किया, तो जिगर मुरादाबादी के शागिर्द हो गए। कहा जाता है कि जिगर मुरादाबादी न होते तो शायद मजरूह सुल्तानपुरी फ़िल्म गीतकार न होते और सिर्फ एक शायर होते।

एक बार की बात है जिगर मुरादबादी को मुशायरे में शरीक़ होने के लिए मुंबई जाना था, वो अपने साथ मजरूह को भी ले गए। मुशायरे में मजरूह का कलाम लोगों को काफी पसंद आया। वहां,  मौजूद उस ज़माने के जाने-माने फिल्म निर्माता ए.आर. करदार भी उनके कलाम से काफी प्रभावित हुए। इस मुशायरे के बाद मजरूह के पास फ़िल्मी गीत लिखने के ऑफर आने शुरू हो गए और वो गीतकार बनने के सफ़र पर निकल पड़े।

मजरूह ने पहली बार 1946 में रिलीज़ हुई 'शाहजहां' फ़िल्म के लिए गीत लिखे। इसके गाने इतने मक़बूल हुए कि उन्हें कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। उन्होंने क़रीब 350 फ़िल्मों में 2000 से ज़्यादा गाने लिखे। वैसे तो मजरूह के मशहूर गानों की फेहरिस्त काफ़ी लंबी है और उनका सबका ज़िक्र यहां मुमकिन भी नहीं है। मजरूह के  गुलशन में, 'छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा..., ले के पहला, पहला प्यार, भरके आंखों में खुमार..., छोड़ दो आंचल ज़माना क्या कहेगा..., पहला नशा पहला खुमार, नया प्यार है नया इंतज़ार..., क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा..., बाहों में चले आओ...,ओ मेरे दिल के चैन..., चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे..., बार बार देखो,  हज़ार बार देखो.., रात कली एक ख़्वाब में आई..., हाल कैसा है जनाब का..., आज मैं ऊपर, ज़माना है नीचे..., जैसे नायाब गीत है।

सुल्तानपुर के रहने  मजरूह का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को आज़मगढ़ के निज़ामाबाद में हुआ था। मजरूह का असली नाम असरारुल हसन खान था। उनके  पिता एक हेड कॉन्सटेबल थे। मजरूह के पिता नहीं चाहते थे कि वह इंग्लिश मीडियम में पढ़ें और इसिलए उन्हें मदरसे पढ़ने के लिए भेज दिया गया। हालांकि, फु़टबॉल खेलने को लेकर हुए किसी मसले की वजह वो मदरसे की पढ़ाई पूरी न कर सके। इसके बाद मजरूह ने हकीम बनने का सोचा और इसके लिए उन्होंने हिकमत की बाक़ायदा लखनऊ से पढ़ाई की। लेकिन क़िस्तम को कुछ और ही मंज़ूर था।  कुछ वक़्त प्रैक्टिस करने के बाद उन्होंने हकीमी भी छोड़ दी और बन गए शायर।

मजरूह पहले गीतकार हैं जिन्हें 1993 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया। इसके अलावा उन्हें 'दोस्ती' फिल्म के गीत 'चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे' के लिए फिल्म फेयर का बेस्ट लिरिसिस्ट अवार्ड दिया गया था। 

शोहरत की बुलंदियों को छूने वाले मजरूह सुल्तानपुरी को बुरे दौर से भी गुज़रना भी पड़ा। मुंबई में रहते हुए एक वक़्त ऐसा भी आया जब उन्हें आर्थिक तंगी के कारण अपना घर और कारें बेचनी पड़ीं। हिंदी सिनेमा को बेशक़ीमत गीतों से नवाज़ने वाले मजरूह ने आखिर इस दुनिया को 24 मई 2000 को अलविदा कह दिया। ऐसे लगता है 'शाहजहां' फ़िल्म का ये गाना उन्होंने दुनिया के बदलते मिज़ाज को ध्यान में रखकर लिखा था:-

जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे

उलफ़त का दिया हमने, इस दिल में जलाया था  
उम्मीद के फूलों से, इस घर को सजाया था 
इक भेदी लूट गया, इक भेदी लूट गया
हम जी के क्या करेंगे, हम जी के क्या करेंगे

मालूम ना था इतनी मुश्किल हैं मेरी राहें

अरमां के बहे आंसू, हसरत की भरी आहें
हर साथी छूट गया, हर साथी छूट गया
हम जी के क्या करेंगे, हम जी के क्या करेंगे
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