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मुड़ मुड़ के देखता हूं

रवायतों को बदलते ग़ालिब के ख़ुतूत - 1

दीपाली अग्रवाल काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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“हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और”


इस बात में कोई दोराय नहीं है कि मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी के एक मक़बूल शायर थे। उनका अंदाज़-ए-सुख़न न सिर्फ़ जुदा था, बल्कि लोगों को अपना निगार बनाने की तासीर भी रखता था। उनके कलामों को उर्दू ज़ुबान में जो अज़मत मिली वो बेजोड़ है। आज भी ग़ालिब से उर्दू की तालिम के लिए शागिर्दी की जा सकती है। 

मिर्ज़ा ग़ालिब जितने मशहूर हुए, उतने ही नामवर हुए उनके लिखे ख़ुतूत, मिर्ज़ा साहब के आख़िरी दिनों में उनके ही एक शागिर्द अब्दुल ग़फ़ूर सुरूर ने उनके ख़तों को छापने की इच्छा ज़ाहिर की लेकिन ग़ालिब ने इंकार कर दिया। इसके बाद मिर्ज़ा साहब ने मुंशी नारायण को लिखा:
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"उर्दू ख़ुतूत जो आप...

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