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जिगर: अपनी रवायतों का एक ज़िंदादिल शायर

मैं इनका मुरीद

जिगर मुरादाबादी: अपनी रवायतों का एक ज़िंदादिल शायर

शरद मिश्र, नई दिल्ली

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'दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गयी कि यार का पैग़ाम आ गया' 


जिगर मुरादाबादी का यह शेर बता रहा है कि जिगर जिंदगी को भरपूर जीने के बाद मोहब्बत में डूबे हुए मौत का कितनी शिद्दत से इंतज़ार कर रहे थे। मौत से डरने वालों के लिए  यह शेर एक पैगाम हो सकता है। जिगर मुरादाबादी-मोहब्बतों का शायर नामक किताब (वाणी प्रकाशन दरियागंज) की भूमिका में प्रसिद्ध शायर निदा फाजली ने लिखा है कि जिगर मुरादाबादी का जन्म एक धार्मिक परिवार में हुआ और वह उस तहजीब के वारिस थे, जिसमें अच्छाई-बुराई और नेकी-बदी की अलग-अलग पहचानें थीं। जिगर ने अपनी इस विरासत का कभी किसी संदर्भ में मुआयना नहीं किया। या यूं कहें कि उनको कृत्रिम जीवन पर भरोसा नहीं था। यहां तक कि जिगर किताबी तालीम को भी शायरी के लिए हानिकारक समझते थे। वह मकतब की प्रारंभिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पाए। जिगर का ऐसा  फक्कड़पन भाव मुझे उनके करीब लाता है। जिगर के हमेशा मोहब्बत में डूबे रहने की वजह से मैं उनका मुरीद हूं।   
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जिगर मिज़ाज से आशिक़ और तबियत से हुस्नपरस्त थे...

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