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jagjit singh

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जग जीतने वाली आवाज़ जगजीत सिंह...

आलोक श्रीवास्तव, प्रसिद्ध लेखक

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जबसे जगजीत भाई गए हैं तब से क़ैफ़ी साहब के ये मिसरे दिल में अक्सर दस्तक देते रहते हैं - ‘रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।’ और दिल है कि मानने को तैयार नहीं। कहता है - 'हम कैसे करें इक़रार, के' हां तुम चले गए।'

'24, पुष्प मिलन, वार्डन रोड, मुंबई-36.' के सिरहाने से झांकती 11 अक्टूबर की सुबह। अपनी आंखों की सूजन से परेशान थी। इस सुबह की रात भी हम जैसों की तरह कटी। रो-रो कर। सूरज को काम संभाले कोई दो घंटे गुज़र चुके थे। जगजीत जी के घर 'पुष्प मिलन' के सामने गाड़ियों का शोर मचलने लगा था. लेकिन चेहरों की मायूसी, आंखों की उदासी और दिलों के दर्द पर कोई शोर, कोई हलचल, कोई हंगामा तारी नहीं हो पा रहा था। जिस आंख में झांकों वही कह रही थी - 'ग़म का फ़साना, तेरा भी है मेरा भी।'
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ग़ज़ल-गायिकी का जादूगर यहीं सो रहा था...

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