किस्सा: हाय रे उन रातों को कहां से खोजकर लाऊं !

किस्सा: हाय रे उन रातों को कहां से खोजकर लाऊं !
                
                                                             
                            'यादों की बारात' उर्दू के बहुचर्चित शायर जोश मलीहाबादी की आत्मकथा है, हंसराज रहबर द्वारा अनूदित यह किताब 'राजपाल एण्ड सन्ज' प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। इस किताब में कई किस्से हैं। एक जगह जोश मलीहाबादी साहब फ़रमाते हैं- 
                                                                     
                            

अफ़सोस कि मैं यह लिखने के लिए ज़िंदा हूं कि मजाज़ मर गया। यह कोई मुझसे पूछे कि मजाज़ क्या था और क्या हो सकता था। मरते वक़्त तक उसका फ़क़त एक चौथाई दिमाग खुल पाया था और उसका यह सारा कलाम उस एक चौथाई खुलावट का करिश्मा है। अगर वह अपने बुढ़ापे की तरफ़ आता तो अपने ज़माने का सबसे बड़ा शायर होता। मगर अफ़सोस कि  पीना उसे खा गया। 

मैंने मजाज़ को मुख़ातिब कर के एक 'पंदनाम' (सीख) कहा था। वह मेरी नज़्म सुनकर रोया था कि आपको मुझसे किस क़दर मुहब्बत है। मगर उस पर अमल नहीं कर सका। अमल करता भी तो कैसे ? 

बार-बार कह चुका हूं कि यों तो दुनिया के हर काम में संतुलन बनाना बेहद मुश्किल है, लेकिन शराब में संतुलन बनाना तक़रीबन मुहाल। 

मजाज़ संतुलन न बना सका लेकिन जवानी में यह कहता हुआ गुज़र गया कि- 

हम मैकदे की राह से होकर गुज़र गए
वरना सफ़र हयात के बेहद तवील था। 
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1 month ago
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