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इंदिरा गांघ

मुड़ मुड़ के देखता हूं

बशीर बद्र का वह शेर जिसके ज़रिए इंदिरा गांधी ने ज़ाहिर किए अपने मन के एहसास

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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कविता और शायरी आदि मन की अभिव्यक्तियों को व्यक्त करने का एक माध्यम है और इसलिए राजनीति में भी अक्सर नेता विपक्ष पर निशाना साधने के लिए शेर का इस्तेमाल कर लेते हैं। 
एक उदाहरण ऐसा भी है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी बात को कहने के लिए बशीर बद्र के शेर का सहारा लिया

ग़ज़लों के बारे में बात करते हुए, उर्दू के अज़ीम शायर बशीर बद्र साहित्य अकादमी से प्रकाशित अपनी किताब 'आस' में लिखते हैं कि 
"ग़ज़ल के सच्चे शेर बच्चों की वो मासूमियत हैं जिनमें हज़ारों साल की बुजुर्गी मुस्कुराती है और फिर साठ साला तजरुबाकार ज़हन व दिल में फूल जैसे बच्चे कुछ पाने की ज़िद में मचलने लगते हैं। शायद ही कोई लम्हा होगा जब सियासी ज़िम्मेदारियोंं और अज़मतों की शख़सियत इंदिरा गांधी ने अपनी एक राज़दार सहेली ऋता शुक्ला टैगोर शिखर पथ, रांची-4 को अपने दिल का कोई अहसास इस शेर के वसीले से वाबस्ता किया था।

"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए"
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