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हसरत मोहानी

मुड़ मुड़ के देखता हूं

वह शेर जो हसरत मोहानी ने जेल में चक्की पीसते हुए पड़ा था …

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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उन दिनों लोकमान्य तिलक स्वराज्य-आन्दोलन बहुत सरगर्मी से चला रहे थे और हसरत मोहानी उनके समर्थक हो गए। शिक्षा समाप्त कर नौकरी आदि के चक्कर में ना पड़कर हसरत ने साहित्य और राजनैतिक विचारों से ओत-प्रोत ‘उर्दू-ए-मोअल्ला’ मासिक-पत्र 1904 में अलीगढ़ से निकालना प्रारम्भ कर दिया

‘हसरत जैसे निर्धन युवक के लिए पत्र-प्रकाशन करना कण्टकाकीर्ण मार्ग पर चलना था, परन्तु इरादों के मजबूत और धुन के पक्के ‘हसरत’ को विचलित करने का साहस किसमें था? उर्दू-ए-मोअल्ला बडे़ आबोताब से चलता रहा।

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1908 में...

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