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Itana Sannata kyun

मुड़ मुड़ के देखता हूं

इतना सन्नाटा क्यूं

Ghanshyam Bairagi

92 कविताएं

79 Views
आसमान पर
नई उड़ान,
भरने आतुर
है नई पहचान.
चला आखिरी
है यह पड़ाव ;
फिर,
इतना सन्नाटा क्यों है.
गली-गली और
डगर-डगर,
चलते-चलते तेज नजर
फिर मंजिल में
जा के देखा,
अब 
इतना सन्नाटा क्यों है
चीरती
चलती हुई पतवार,
तेज धार
पर फिकर नहीं 
अब तो है
मंजिल भी करीब
फिर 
इतना सन्नाटा क्यों है
कहीं तो
सब-कुछ पा ही लिया,
पर 
विश्वास न कहीं मिला
अब यह
जंग जीत भी जायें ;
फिर ;
ये सन्नाटा है क्यों.
छोड़ें
हार-जीत की बाजी,
चलते-चलते
मिले जो साथी.
बस अब
हाथ मिलाना साखी ;
अब कैसा सन्नाटा बाकी.
यही कर्म हैं यही धर्म हैं
जीवन में,
सत्संग ही क्रम हैं.
तब सब,
साथ चलेंगे मिलकर ;
अब न कहें सन्नाटा क्यों है.

- घनश्याम जी. वैष्णव बैरागी

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