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Ghalib Letters 6

मुड़ मुड़ के देखता हूं

रवायतों को बदलते ग़ालिब के ख़ुतूत - 6

दीपाली अग्रवाल काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ये है ग़ालिब के ख़तों की छठवीं किश्त

कहते हैं कि अगर ग़ालिब उर्दू, फ़ारसी की शायरी न भी करते तो भी अपने ख़तों के सहारे ही अमर हो जाते। उनके फ़ारसी के पत्र पंज अहंग के नाम से छपे हैं जिसे कम लोग ही जानते हैं लेकिन उनके उर्दू के पत्र ख़ासे लोकप्रिय हैं। बीते दिनों हमने इन्हीं पत्रों की एक सीरीज़ चलाई है।

पिछले पत्रों से पता चला कि मिर्ज़ा ग़ालिब एक ख़ुशमिजाज़ और ज़िंदादिल इंसान थे और नेक इस कदर की वह दूसरों की मुसीबत को भी अपनी ही मुसीबत समझते थे। यह पत्र इसी की एक बानगी है जिसे मिर्ज़ा साहब ने मास्टर प्यारेलाल को लिखा है। वह पंजाब में भाषा विभाग में काम करते थे और ग़ालिब से मुहब्बत रखते थे।

पढ़िए यह ख़त आगे पढ़ें

अब ये ग़रीब बहुत तबाह है...

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