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काव्य

भूले भटके मुसाफिर

Dhanawat Sanjay

24 कविताएं

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मुझसे इन मिटटी के पुतलों की मंशा मत रख
तुझे आसमान में सजाने को जी चाहता है
तू थोड़ा सा इश्क़ तो कर मुझसे
मेरा भी ताजमहल बनाने को जी चाहता है
सारी उम्र गुजर गयी तेरी झूठ सांच गंडक लड़ाई में
ए आदमी तुझे इंसानियत सीखाने को जी चाहता है
जाने किस दरिंदे ने खींच दी
इस मासूम बदन पर लकीरें
किसका था
हिन्दू का, मुस्लिम का, सिख का, ईसाई का
मैं भेद नहीं कर पाया
मुझे तो एक से ही लगे जब बहे थे ये दरिये खून के
ए भारत माता इस तिरंगे की कसम
मुझे फिर वो ही बेदाग गोरा बदन हिंदुस्तान बनाने को जी चाहता है

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