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meena kumari

मुड़ मुड़ के देखता हूं

... जब नौशाद साहब ने मीना कुमारी के लिये शेर लिखा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जब-जब भारतीय फ़िल्मों का इतिहास लिखा जाएगा, 'पाकीज़ा' का ज़िक्र ज़रूर होगा। यही वो फिल्म है जिसने मीना कुमारी को अमर कर दिया। इस समय तक वो अभिनेत्री के तौर पर मशहूर हो चुकी थीं। 

लेकिन इससे इतर 'ट्रेजडी क्वीन' मीना कुमारी एक शायरा भी थीं। उन्होंने अपने जीवन के दर्द और अहसासों को ख़ुबसूरत अल्फ़ाजों में ढाला भी ।  चांद तन्हा है आसमां तन्हा, दिल मिला है कहां-कहां तन्हा, टुकड़े-टुकड़े दिन बीता, शीशे का बदन, उनकी लिखी नज़्में हैं। 

'पेंगुइइन बुक्स' से प्रकाशित किताब -'नौशाद, जर्रा जो आफ़ताब बना' में लेखक चौधरी ज़िया इमाम ने मीना कुमारी के अंदर उमड़-घुमड़ रहे जज़्बातों से संबंधित एक छोटे से किस्से का जिक्र करते हैं। 

हुआ यूं कि फ़िल्म 'पाकीज़ा' पूरी होने के बाद एक दिन मीना कुमारी संगीतकार नौशाद साहब के घर गईं और उनके काम की तारीफ़ की। उन दिनों मीना कुमारी की तबीयत ख़राब रहती थी। उन्होंने नौशाद साहब से कहा कि- '' नौशाद साहब जब रात आती है तो मुझे सुबह का इंतजार रहता है और जब दिन आता है तो रात आने का ख़ौफ़।''

इस पर नौशाद साहब ने मीना कुमारी को एक शेर लिखकर दिया था-

देख सूरज उफ़क़ में डूब गया, धूप एक सिर से तेरे और ढली 
एक दिन उलझनों का और गया, एक कड़ी जिंदगी की और कटी।।
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