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बशीर बद्र

मुड़ मुड़ के देखता हूं

बशीर बद्र: हर वक्त मुहब्बत का है साया, तन्हाई का मलाल कैसा...  

आलोक श्रीवास्तव, नई दिल्ली

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बशीर बद्र हों या दिलीप कुमार, हिंदी-आलोचना के प्रतिमान नामवर सिंह हों या कविता के ज्ञानपीठ केदारनाथ सिंह, यह सब हमारे बुज़ुर्ग हैं और उससे भी कहीं ऊपर यह सब,और इन जैसे कई दिग्गज एक पूरा दौर हैं, युग हैं, भरा-पूरा समय हैं।

यह लोग एक ऐसा अहद हैं, जिन्हें आप ना-पसंद तो कर सकते हैं, लेकिन नकार नहीं सकते। क्योंकि इनके ज़िक्र के बिना, आपके दौर का इतिहास ही अधूरा रहेगा। आप ध्यान न भी दें तो भी इनका किया काम, हमेशा आपके आसपास रवाँ-दवाँ और जवाँ रहेगा। इनके किरदार कभी ‘बूढ़े’, ‘लाचार’, ‘माज़ूर’, ‘तन्हा’ या ‘अकेले’ नहीं होंगे। आगे पढ़ें

इनका काम ही, इनकी मुहब्बत है। ये उसी के साथ जीते हैं...

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