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साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम

मुड़ मुड़ के देखता हूं

जब रात दो बजे अमृता को फ़ोन आया कि, “साहिर नहीं रहे”

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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अमृता प्रीतम के मन में साहिर के लिए जो जज़्बात थे, उसे उन्होंने अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में खुलकर बयान किया है लेकिन सबसे कठिन अमृता के लिए वह क्षण होगा जब उन्होंने साहिर के निधन की ख़बर सुनी होगी।
उन पलों को अमृता ने रसीदी टिकट में कुछ यूं लिखा है कि...

"पचीस और छब्बीस अक्टूबर की रात को दो बजे जब फ़ोन आया कि साहिर नहीं रहे, तो पूरे बीस दिन पहले की वह रात, उस रात में मिल गई, जब मैं बल्गारिया में थी, डॉक्टरों ने कहा था कि दिल की तरफ़ से मुझे ख़तरा है, और उस रात मैंने नज़्म लिखी थी, "अज्ज आपणे दिल दरिया दे विच्च मैं आपणे फुल्ल प्रवाहे..." अचानक मैं अपने हाथों की ओर देखने लगी कि इन हाथों से मैंने अपने दिल के दरिया में अपनी हड्डियां प्रवाहित की थीं, पर हड्डियां बदल कैसे गईं ? यह बुलावा मौत को लग गया कि हाथों को ? आगे पढ़ें

साथ ही

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