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रहे ना रहे हम...

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

रहें ना रहें हम...मोहब्बत की लंबी दास्तां...

शरद मिश्र, अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मोहब्बत को समय से पार एक गहरा मुकाम देता यह गीत दिल के विश्वास को व्यक्त करता है। 1966 में रिलीज फिल्म 'ममता' का यह गीत प्रेम के भीने भावों को हमेशा फ्रेश रखेगा। महरूह सुल्तानपुरी के सुंदर बोल और रौशन के सदाबहार संगीत ने इस गीत को मधुर बनाया है। इस गीत में प्रेम के विश्वास को बुना गया है। गीत में सच्चे प्रेमी के विश्वास की पावन तस्वीर नजर आती है। लिहाजा यह गीत मुझे हमेशा से पसंद रहा। 

रहें ना रहें हम, महका करेंगे
बन के कली, बन के सबा, बाग़े वफ़ा में…


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मौसम कोई हो इस चमन में...रंग बनके रहेंगे इन फ़िज़ा में

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