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Jab deep jale aana a song holds high values in love and expressions

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

एक शालीन प्रणय निवेदन: जब दीप जले आना...

कुमार अतुल, मुरादाबाद

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धुंधलाती सुरमई शाम में प्रियतमा के आगमन की प्रतीक्षा करते नायक के लिए इससे बेहतर गीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। येसुदास की मखमली आवाज में एक शालीन सा प्रणय निवेदन प्रस्तुत करता गीत आज भी कानों में मिसरी घोल देता है। 1976 में प्रदर्शित हुई राजश्री प्रोडक्शन की बासु चटर्जी निर्देशित फिल्म चितचोर का यह गाना येसुदास के सर्वोत्तम गीतों में से एक है। 

ये गीत उस स्वर्णिम दौर की याद दिलाता है जब राजश्री जैसे बैनर हंसती, गुदगुदाती, कभी पलकों के कोर भिगोती फिल्में बनाया करते थे। ऐसी फिल्में जिसके सारे के सारे किरदार भले हों। कोई खलनायक न हो। हर शख्स दूसरे के लिए कुर्बानी देने को तैयार हो। जब शाम ढले आना..के  गीतकार और संगीतकार रवींद्र जैन थे जिन्होंने राजश्री बैनर की फिल्मों के लिए अपना सर्वोत्तम संगीत दिया। 

चितचोर के ही दूसरे गीत ...गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा, मैं तो गया मारा.. और आज से पहले, आज से ज्यादा.. खुशी आज तक नहीं मिली भी बेहद लोकप्रिय हुए थे। गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा पर तो बतौर गायक येसुदास को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। लेकिन जब शाम ढले आना की अलग ही रेंज और मधुरता है। इस गीत का सौंदर्य काव्य की दृष्टि से भी अनूठा है। आगे पढ़ें

युवास्था की दहलीज पर खड़ी नायिका और एक गंभीर प्रेमी की प्रतीक्षा

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