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Gulon mein rang bhare baad e nau bahar chale

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले…

दीपाली अग्रवाल काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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कविता, ग़ज़ल, नज़्म और किसी भी काव्य की विधा को लिखने के लिए प्रेरणा चाहे जहां से मिली हो लेकिन लिखने का तरीका एक ही है और वह है अपने मन के सबसे निचले तल पर जाकर वहां खोज करना और जो मिले उसे अल्फ़ाज़ों में क़ैद कर देना।

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले


ज़ाहिर है कि इन अल्फ़ाज़ों को सुनकर लगेगा कि लिखने वाले ने किसी गुलशन में बैठ कर यह कह दिया होगा लेकिन ताज्जुब कि यह गाना जेल में लिखा गया है। यूं अंधेरे कमरे में ऐसा कह देना मुमकिन इसलिए भी है चूंकि प्रेरणा चाहे जहां से मिली हो लेकिन लिखने का तरीका एक ही है और वह तरीका कम-अज़-कम किसी बाहरी स्थिति का मोहताज नहीं है।
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