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दो दीवाने शहर में...

मेरे अज़ीज़ फिल्मी नग़मे

प्यार का घरौंदा: एक दीवाना शहर में, एक दीवाना नहीं...एक दीवानी भी...

शरद मिश्र, अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जीवन में एक दूसरे का साथ पाकर आदमी में निखार आता है। दुनिया की भीड़ में अकेले आदमी को बस एक सच्चा सहारा मिल जाए तो उसकी जिंदगी मुकम्मल हो जाती है। धन-दौलत जिंदगी के साथ को सुनहरा कर सकता है पर यादगार नहीं बना सकता। यादगार होने के लिए आपको दिल का मखमली एहसास चाहिए। 1978 में रिलीज फिल्म घरौंदा का गीत दो दीवाने शहर में...साथ और सहयोग की सुनहरी दास्तां अपने में समाए हुए है।  आगे पढ़ें

आब-ओ-दाना ढूँढते हैं एक आशियाना ढूँढते हैं...

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