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मेरे अल्फाज़

ज़िन्दगी ज़रा भी खुशहाल नहीं है

Zafaruddin Zafar

188 कविताएं

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ज़िन्दगी ज़रा भी खुशहाल नहीं है,
मेरी ख़ुशबुओं से बोलचाल नहीं है।

नींद भी आजकल रहती है दूर-दूर,
ख़्वाबों की थोड़ी देखभाल नहीं है।

उसकी सोच में हैं फ़ितरत के फंदे,
वैसे तो हाथों में कोई जाल नहीं है।

अरमां मेरे जैसे मक़तल में आ गए,
कहां जा कर बोलूं ससुराल नहीं है।

मुझे मुद्दत हो गए दुआ करते करते,
मगर घर में अभी नौनिहाल नहीं है।

ये ईद भी आ कर ईद सी नहीं लगी,
कैसे कह दूं मेरा खस्ताहाल नहीं है।

ऐ हसरतों धूप में ठहर कर देख लो,
सायबान मुझ पर फिलहाल नहीं है।

कर ली बहुत याद, आती नहीं मगर,
जो रात आंसुओं से बदहाल नहीं है।

"ज़फ़र" ग़मगीन शायद हो इसलिए,
ग़ज़ल मिसरों से माला-माल नहीं है।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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