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मेरे अल्फाज़

वो शोहरत की बुलंदियों से ऊपर चला गया

Zafaruddin Zafar

189 कविताएं

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ग़ज़लों से सब के मन को छू कर चला गया,
वो शोहरत की बुलंदियों से ऊपर चला गया।

तू मुशायरों में जाकर कैसे जलवा दिखाएगी,
ऐ शायरी दुनिया से दूर तेरा झूमर चला गया।

ये बहेलिया बैठा रहा सियासत के फंदे लिए,
दाना क़िस्मत का चुगकर कबूतर चला गया।

बदलते हुए हालात पर निशाना लगाए कौन,
कल अशआर की बंदूक का शूटर चला गया।

राहत के बिना एक दिन गुज़रा है शायरी का,
ये लगता है मगर सदियों का हूटर चला गया।

ये सियासत के पेड़ लगाना अंजाम सोचकर,
नफ़रतों को ठंडा करने का कूलर चला गया।

एक उसके चले जाने से उदासियों में डूबकर,
'ज़फ़र' चांद का सफ़र होता दूभर चला गया।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32



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