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मेरे अल्फाज़

मेरे हुस्न के बग़ीचे में फूल मुरझाने लगे

Zafaruddin Zafar

188 कविताएं

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सफेद बाल ऐसी ताक़त आज़माने लगे,
मेरे हुस्न के बग़ीचे में फूल मुरझाने लगे।

उम्र का हिस्सा लगा खाद पानी में मगर,
मुश्किल से सारे भुट्टों पर चार दाने लगे।

मिज़ाज उसका ही बदला नहीं है आज,
उसकी गली के कुत्ते भी काटखाने लगे।

बुढ़ापे को जवानी में बदलता नहीं कोई,
मुल्क के विकास में कैसे कारखाने लगे।

सेहत के वास्ते लिए जो मश्वरे हकीम से,
सूखे गुलाब गुल-कंद में काम आने लगे।

ये हौसला है कि गुलशन में टहल आऊं,
मगर घुटनों के दर्द से ही मार खाने लगे।

हिम्मत नहीं थी जिनकी सिर उठाने की,
ये ऐसे वैसे लोग भी तलवे चटवाने लगे।

मेरे बूढ़े होते ही वक़्त में बदलाव आया,
ख़्वाब भी नींद को आज धमकाने लगे।

काग़ज़ पर उतरता है हाल ज़िन्दगी का,
यूं ग़ज़ल लिखने में 'ज़फ़र' शरमाने लगे।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ़-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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