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मेरे अल्फाज़

कुछ भी भूला मगर लहज़ा नहीं भूला

Zafaruddin Zafar

176 कविताएं

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उस से मुलाक़ात का लम्हा नहीं भूला,
कुछ भी भूला मगर लहज़ा नहीं भूला।

गया है ज़िन्दगी में जो ज़हर घोल कर,
उस शख्स का कभी चेहरा नहीं भूला।

तूफान में इस पार से उसपार चली गईं,
ऐसी ही कश्तियों को दरिया नहीं भूला।

मैं खुश रहा इसलिए मुल्क़ के लोगों से,
कोई भी मेरे खून का क़तरा नहीं भूला।

तन से दूर रहा इसलिए मग़रिबी फैशन,
मेरा ज़हन गांधी का चरखा नहीं भूला।

अमीरी ने अपने तन से कपड़े घटा दिए,
ग़रीब घर पर टाट का परदा नहीं भूला।

मैंने शहर में आ के फ्रिज ले लिया मगर,
कभी अपने गांव का मटका नहीं भूला।

कुछ पल मेरे रूबरू होकर तो देखिएगा,
पढ़ लुंगा तमाम चेहरा चश्मा नहीं भूला।

उसको दे दिया अपना दिल निकालकर,
ज़फ़र'मर गया मगर सदक़ा नहीं भूला।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ़ -413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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