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मेरे अल्फाज़

अपनों में कभी ख़ुशी का घाटा नहीं किया

Zafaruddin Zafar

188 कविताएं

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अपनों में कभी ख़ुशी का घाटा नहीं किया,
मैंने अपने ग़मों को कभी साझा नहीं किया।

ये मालूम था कि दूर तक मंज़िल नहीं मगर ,
कभी राहों को बदलने का इरादा नहीं किया।

चाहे कितना ही दम घोटा है मेरा ज़रूरतों ने,
कभी भी अपने हाथों को कासा नहीं किया।

ऐ मौत कहीं और जाकर ढूंढ ले अपना चारा,
मैंने दिल की ख़ुशियों से मुसाफा नहीं किया।

कल भी नींद ने बार बार भरोसा दिया मगर,
अपने ख़्वाब को आंखों में ताज़ा नहीं किया।

बेशक आंधियां ले गईं थीं दीपक खरीद कर,
मगर उजालों ने रहबरी का वादा नहीं किया।

तूने उलझा के रख दिया अलग बात है मगर,
चींटीयों ने कभी शेर का निवाला नहीं किया।

दर्द की तपिश ने दिल राख कर के रख दिया,
मगर अपने गुस्से को कभी लावा नहीं किया।

बंटना किसी भी ख़्वाब का अच्छा नहीं होता,
यूं बुजुर्गो की विरासत को आधा नहीं किया।

मेरी सारी हसरतों के मोती बिखरते रहे मगर,
ये घर चलाना था इसलिए माला नहीं किया।

ज़फ़र अजनबी बनकर साथ रहता रहा मगर,
एक बार साफ़ मेरे मन का जाला नहीं किया।

-ज़फ़रुद्दीन "ज़फ़र"
एफ-413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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