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मेरे अल्फाज़

अभी एक पारी चल रही है एक पारी हो गई

Zafaruddin Zafar

157 कविताएं

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खेल खेल में ही उनकी साज़िश सारी हो गई,
अभी एक पारी चल रही है एक पारी हो गई।

सरहदों की हलचलों में नया नुस्खा मिल गया,
हथियारो की खरीद में लूट की तैयारी हो गई।

अन्दर तक दहला हुआ था आज अमीरे शहर,
मन की हालत कहने में आवाज़ भारी हो गई।

उसने कभी सुना नहीं भूख का शिकवा कोई,
महंगाई से जनता में बेशक मारामारी हो गई।

अब और कितने ज़ुल्मो के सुबूत तुम्हें चाहिए,
वो मीठे-मीठे पानी की नदी भी ख़ारी हो गई।

ये इसलिए बिगड़ गया सारा निज़ाम ए मुल्क,
दोस्तों को छोड़ दिया दुश्मनों से यारी हो गई।

घोटाले वालों की लम्बी सी फेहरिस्त थी मगर,
सरकार की उन पर इनायत बारी बारी हो गई।

कोई अदालतों को जैसे कुछ समझता ही नहीं,
यूं इंसाफ़ की सड़कों पर खुद मुख्तारी हो गई।

किस क़दर पाबन्दियां हैं ज़िन्दगी पर आजकल,
ज़फ़र' चैन की सांस लेना भी दुशवारी हो गई।

-ज़फ़रुद्दीन"ज़फ़र"
एफ -413,
कड़कड़डूमा कोर्ट,
दिल्ली-32


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