सपनों के पँख

                
                                                             
                            फिर एक सुबह सूरज निकला, सपनों की अंगड़ाई से,
                                                                     
                            
जीने लगा हूँ उन ख्वाबों को, जिन्हें देखता हूँ गहराई से।

कौन है मेरे सिवा इनका यहां,
देखा है इन आंखों ने नया जहां।

करना है मुकम्मल, उन नजारों को,
जो देखती है, बंद आंखें इन राहों को।

जल रही अंदर एक कसक, एक आग,
संभल जाये बुझती हुयी यह चिराग।

कुछ अलग सा, कुछ नया है यह एहसास,
जो थामे हुए हैं इन हौसलों का जो हैं इतने खास।

बार-बार यह दिमाग पूछ रहा है खुद से,
कौन हूं मैं, क्यूं हूं मैं, क्या चाहिए इस वजूद से।

फिर एक सुबह सूरज निकला, सपनों की अंगड़ाई से,
जीने लगा हूं उन ख्वाबों को, जिन्हें देखता हूं गहराई से।

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 years ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
X