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मेरे अल्फाज़

सपनों के पँख

Yogank Singh

2 कविताएं

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फिर एक सुबह सूरज निकला, सपनों की अंगड़ाई से,
जीने लगा हूँ उन ख्वाबों को, जिन्हें देखता हूँ गहराई से।

कौन है मेरे सिवा इनका यहां,
देखा है इन आंखों ने नया जहां।

करना है मुकम्मल, उन नजारों को,
जो देखती है, बंद आंखें इन राहों को।

जल रही अंदर एक कसक, एक आग,
संभल जाये बुझती हुयी यह चिराग।

कुछ अलग सा, कुछ नया है यह एहसास,
जो थामे हुए हैं इन हौसलों का जो हैं इतने खास।

बार-बार यह दिमाग पूछ रहा है खुद से,
कौन हूं मैं, क्यूं हूं मैं, क्या चाहिए इस वजूद से।

फिर एक सुबह सूरज निकला, सपनों की अंगड़ाई से,
जीने लगा हूं उन ख्वाबों को, जिन्हें देखता हूं गहराई से।

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