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मेरे अल्फाज़

ख़ुद में गिरता पड़ता हूँ मैं

Yash Trivedi

18 कविताएं

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ख़ुद में गिरता पड़ता हूँ मैं
अंदर - अंदर लड़ता हूँ मैं

नज़रों में तिनके सा पड़कर
उन आँखों में गड़ता हूँ मैं

अश्क़ बहा के इन आँखों से
रेत सा सूखा पड़ता हूँ मैं

चलते चलते इन रस्तों पर
अपने पैरों पे अड़ता हूँ मैं

आंधी में उनकी यादों की
सूखे पत्तों सा झड़ता हूँ मैं

रोज़ ज़रा 'यश' हौले - हौले
इक अपने से बिछड़ता हूँ मैं

साथ अकेले ख़ुद के रहकर
कैसी सुहबत में पड़ता हूँ मैं

~यश


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