आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Democracy

मेरे अल्फाज़

लोकतंत्र

World Indian

1 कविता

30 Views
जो क्षण भर के कार्य वर्ष भर में करते थे, वे भी आगे चलकर न्यायाधीश बने
जिनकी नीतियां कभी प्रजा के हित में न थीं, वे भी अवसर पाकर सत्ताधीश बने
जिन नियमों को निर्विवाद पारित होना था, वे संसद में संशोधित क़ानून बने
जो सिद्धांतों के पथ से न कभी हटे हों, वे क्यों दुनिया की दृष्टि में न्यून बने
वे जिनका अस्तित्व सिर्फ अभिशाप बना था, वे कैसे लाखों सिर पर आशीष बने
जिनके जीवन राजभवन तक ही सीमित थे, वे कैसे जनता के प्राणाधीश बने
जो साधु की संगति से अमृत हो जाते, विसंगति में आकर वे भी गरल बने
जिन वृक्षों से पर्यावरण हरा रहना था, उन्हें काटकर ऊंचे-ऊंचे महल बने

- भारत सचिन 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!