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मेरे अल्फाज़

इंतिहा चाहत की

Wasif Quazi

12 कविताएं

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अब तो तन्हाई से भी डरने लगे हैं ।
हम ख़ुद से ही गुफ्तगू करने लगे हैं ।।

इश्क़ को आसान समझकर हम ।
दरिया ए आतिश पर चलने लगे हैं ।।

गैरों ने संभाला है हर दफ़ा हमको ।
अब तो अपनों से भी डरने लगे हैं ।।

किया है सब्र इस चाहत के सौदे में ।
ज़ख्म हमारे अब तो भरने लगे हैं ।।

उनके आने की ख़बर सुनकर अब ।
साज़ मोहब्बत के बजने लगे हैं ।।

वो पूछते हैं चाहत की इंतिहा "काज़ी"।
याद उन्हें करके अब थकने लगे हैं ।।

- डॉ वासिफ़ काज़ी, इकबाल कालोनी ,इंदौर

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