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मेरे अल्फाज़

ज़िन्दगी क्या है

Wajeda Rehman

18 कविताएं

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ज़िन्दगी क्या है?
एक रेलगाड़ी, साँसों के पहिये पर दौड़ती।
कभी रफ़्तार सुस्त पड़ जाती,
कभी इसकी चाल में तेज़ी आ जाती।
सुख के बन में सीटी बजाती,
दुःख की पुलिया पर शोर मचाती।
यक़ीन की रौशनी में दनदनाती,
डर के अँधेरों से है घबराती।
मायूसी के सुरंगों में धीमी पड़ जाती,
उम्मीदों की पटरी पर बढ़ती जाती।
सब्र के पहाड़ों पर मुश्किल से चढ़ती,
बेसब्री के ढलानों पर जल्दबाज़ी करती।
मोहब्बत के मोड़ों से इठलाती गुज़रती,
नफ़रत की राह में फिर किसी की न सुनती।
नहीं कहीं थमती, नहीं कहीं रुकती,
जब तक अपनी मंज़िल से नहीं मिलती।
कभी सफ़र बरसों में तय करती,
मंज़िल कभी चंद मिनटों में पा लेती।
किसी को दरवाज़े पर जगह मिली,
किसी ने 'विंडो सीट' है पा ली।
किसी के पास टिकट जनरल डब्बे की,
कोई मज़े ले रहा एसी बोगी की।
सभी मुसाफ़िरों को वक़्त पर पहुँचाती,
उनके स्टेशनों पर ही उन्हें उतारती।
मंज़िल की ओर दौड़ लगाती,
आख़िर में मौत को पा ही लेती।

- तबस्सुम

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