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मेरे अल्फाज़

इश्क़ है

Wajeda Rehman

18 कविताएं

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कभी टकराना निगाहों का
कभी हया से झुक जाना
इश्क़ है

कभी आँखों में ख़ुशियों के जुगनू
कभी अश्क़ों से तकिये का भीग जाना
इश्क़ है

कभी माँग लेना उसके हिस्से का सारा ग़म
कभी अपनी सारी ख़ुशियाँ नाम कर जाना
इश्क़ है

कभी ताज़ा सुर्ख़ गुलाब है अलामत तो
कभी किताबों में सूखे गुलाबों का मिल जाना
इश्क़ है

कभी महफ़िल में भी तन्हा कर दे
कभी तन्हाई में महफ़िल का मिल जाना
इश्क़ है

कभी सब कह कर भी बात अधूरी है
कभी बिन बोले सब कुछ कह जाना
इश्क़ है

कभी डरता है दिल इस समंदर में उतरने से भी
कभी इसमें डूबने के लिए ललक जाना
इश्क़ है

कभी दिल भरता नहीं सब हासिल होने पर भी
कभी एक शख़्स के मिलने पर सब मिल जाना
इश्क़ है

कभी मिलन तो कभी जुदाई भी
कभी ज़मीं-आसमाँ सा हो जाना
इश्क़ है

कभी तेज़ बारिश भी मोहब्बत की कम पड़ जाए
कभी एक क़तरे से दिल का सराबोर हो जाना
इश्क़ है

कभी टिक कर नहीं रहने वाले चंचल मन का
कभी बस एक शख़्स पर आ कर ठहर जाना
इश्क़ है

कभी चंद हर्फ़ों में सिमट जाए
कभी पूरी दास्ताँ का कम पड़ जाना
इश्क़ है

कभी अपने लफ़्ज़ सा अधूरा कभी हीर-रांझे सा
कभी ख़ुद अधूरा होकर भी क़िस्सा मुकम्मल कर जाना
इश्क़ है

_तबस्सुम

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