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मेरे अल्फाज़

छिपे घावों को सरेआम कौन लिखे

VIVEK YADAV

5 कविताएं

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छिपे घावों को सरेआम कौन लिखे,
तेरे जाने के बाद तेरा नाम कौन लिखे।

जो दिल में था रक्खा छुपाए बरसों से,
अब इक कागज़ पे वो पैगाम कौन लिखे।

इन पहाड़ों में, बहारों में, चाँद तारों में,
कितने रूपों में मिली है तू मुझे कौन लिखे।

कुछ वो लम्हें जो सिर्फ हमने देखे थे,
अब उन लम्हों को मंज़र-ए-आम कौन लिखे।

लोग तन्हाई का कारण जो तलब करते हैं,
क्या कहूं, गीत मेरे हैं मगर ये कौन लिखे।

शोर बरपा है जो हर ओर हंसी की मेरी
इसके पीछे की छिपी सिसकियां अब कौन लिखे।

बीते हैं कई साल तुझको देखे बिना,
मगर तुझ तक जो पहुंच जाए ख़त वो कौन लिखे।

दिल में शिकवे हैं, गिले हैं और शिकायत भी,
कितना लड़ना है मुझे मिलके तुझे, कौन लिखे।

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