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dhundta hu

मेरे अल्फाज़

ढूँढता हूँ

VIVEK YADAV

5 कविताएं

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ढूंढता हूं ज़िन्दगी के अंश में,
कि तू मिले 
मिले खोई ख़ुशी मेरी,
थमी वो ज़िन्दगी चले 
ढूंढता हूं......

तेरे शहर से दूर हूं
बेशक थका ज़रूर हूं
मगर थकान में मेरी
तेरे कई निशां मिले
ढूंढता हूं....

सब अंश आंसुओं भरे
कुछ पढ़े कुछ अनपढ़े
सभी में धुनता तुझे
भुलाके मैं सभी गिले
ढूंढता हूं....

तेरी कमी तो तब भी थी
कि जब तू साथ थी मेरे
मगर तेरी रवानगी के
ना कोई निशां मिले
ढूंढता हूं....

कभी तिमिर भरी निशा
में खो गई छवि तेरी
कभी निशा में भी तेरे
अनेक चंद्रमा मिलें
ढूंढता हूं.....

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