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मेरे अल्फाज़

खंजर भी छुपा जाते हैं

Vivek Tripathi

19 कविताएं

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मौसम बदलना होता है,तो वह भी निशां दे जाते हैं
वो मेरे उन्स का कत्ल कर, खंजर भी छुपा जाते हैं

वह गुनाह भी करते हैं, हमें घायल भी कर जाते हैं
तो कभी प्यार से बोल कर,मरहम भी लगा जाते हैं

आंसुओं में तब्दील हो , हर गुनाह कबूल हो गई
हम दूर चले गए तो, उन्हें लगा उनसे भूल हो गई

जा रहा हूं दूर शायद, अब कभी मिल ना पाएंगे
हर पल तेरे दिल में रहकर, हम बहुत याद आएंगे

दूर होकर कर तुम हमें जो, बेहिसाब रुलाओगे
इन आंखों में जो आंसू हैं,तुम खुद ही डूब जाओगे

हम तो अकेले हो गए थे, तेरे जाने के बाद ही
तुम अकेले हो गए हो, महफिल पाने के बाद भी

जा हर गुनाह माफ किए, तुम मेरी मोहब्बत हो
नूर सा दिल साफ किए हम, तू मेरी इबादत हो

-विवेक त्रिपाठी 'कलम स्वर'

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