आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   शासन भी मूक यहाँ पर है

मेरे अल्फाज़

शासन भी मूक यहां पर है

Vishwa Vijay

25 कविताएं

30 Views
क्या हुआ देश में अलग -अलग परिवेश दिखाई पड़ता है
क्यूं आज़ादी का बार-बार दुश्चक्र सुनाई पड़ता है
तन झण्डा है मन दंगा है क्यूं राह रोक कर बैठे हैं
पूछो तो बात नहीं करते लगता है कितने ऐंठे हैं
इतनी मनमानी देख-देख क्यूंं इतनी चूक यहां पर है
वो खुलेआम धमकाते हैं शासन भी मूक यहां पर है 
रस्ता लाखो का बंद यहां हालत जैसे है जंग यहां
आने - जाने पर टोक यहां मीडिया पर भी रोक यहां
कायम अजेंडे पर वे हैं टुकड़े - टुकड़े धंधे पर हैं
कुछ जहरीली कंधे पर हैं कुछ सरकारी धंधे पर हैं
क्यूं राजधानी की सड्कों पर इतना आतंक चरम पर है
वो खुलेआम धमकाते हैं शासन भी मूक यहाँ पर है 
आखिर क्यों ये बेचैनी है दुश्मन की नज़र भी पैनी है
वो काट - छांट को व्याकुल हैं कुछ देते उनको छैनी हैं
खतरे में संविधान कहते पर रखते कोई आस नहीं
संवैधानिक संस्था पर उनको कुछ भी विश्वास नहीं
विश्व में इतनी आज़ादी विजय पूछते कहां पर है
वो खुलेआम धमकाते हैं शासन भी मूक यहां पर है 


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!