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First Poetry of 2018...नज़्म...✍

मेरे अल्फाज़

पहली नज़्म

Vishay Azad

8 कविताएं

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रात डेढ़ बजे का समय है
तारीख आज साल की पहली है
दूसरे शब्दों में ग़र कहूं तो-
नए साल को आए हुए
डेढ़ घंटा हो चुका है...

कोई जिल्द नहीं चढ़ी है
इस पर...
इस नए साल में
नया क्या है, मालूम नहीं...?

क्योंकि इस डेढ़ घंटे में तो
गुज़रे साल कि तरह ही था सब...
पलकों से नींद गायब थी
औ' उर में सैकड़ों इश्तियाक़...

बिस्तर पर लेटे-लेटे
खुद से ही बतियाता रहा...
तुम संग बीते लम्हों को याद कर
खुद पर ही मुस्काता रहा...

और जब उकता गया
अपने इस बरताव से
तो यहां आ बैठा...

तुमसे बातें करने का मन हुआ
सो, कागज कलम उठा लिये
औ' लिखने लगा...

क्योंकि वैसे तो अब
कहां संभव है अपनी बातें 

पर फिर भी इस
उम्मीद से लिखता हूं-
कि तुम कभी पढ़ोगी इनको...

औ’ पढ़ते हुए ऐसा महसूस करोगी
मानो हम सच में बातें कर रहे हों...

बिल्कुल इसी तरह-
जैसा कि मैं अभी, लिखते हुए
महसूस कर रहा हूं...

मुझे लग रहा है कि तुम
मेरे पास ही बैठी हो...
वही पीला वाला सूट पहनकर...

मालूम होता है कि तुम
अपने दाहिने हाथ का
सहारा लिए बैठी हो...

औ’ अपने गाल को
कन्धे पर टिकाए...
कनखियों से मुझे देख
मुस्करा रही हो...

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