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मेरे अल्फाज़

शत्रु की घेराबंदी

Virendra Kumar

35 कविताएं

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कूटनीति "भारत" की देखो,
हुई शत्रु की घेराबंदी।
विस्तारवादी , इसकी नीति पुरानी ,
कर दो इसकी हदबंदी।

दुनिया को देकर कोरोना,
फिर करने विस्तार चला।
आने लगा समझ कुछ इसको,
किससे पड़ा है, अब पाला।

हरकत से यह बाज न आता,
इसको मुंह की खानी है।
मक्कारी का आलम देखो,
कुछ कथनी, कुछ करनी है।

खाला जी का नहीं है, यह घर,
अब यह बात समझानी है।
होश में आओ, शत्रु तुम्हें,
तुम्हारी औकात दिखानी है।

कूटनीति "भारत" की देखो,
हुई शत्रु की घेराबंदी।
विस्तारवादी , इसकी नीति पुरानी ,
कर दो इसकी हदबंदी।

अब बात सिर्फ़ न, थल की होगी,
जल में भी , अब ना छोड़ेंगे।
इस बार फंसा है , अब ये जाल में ,
बचकर यो न निकलने देंगे।

हड्डी के टुकडे, डाल रहा है,
आसपास के देशों को।
इसकी चाल न समझ रहे वो,
और छुपे संदेशों को।

सहम गया है , अब यह देखो,
शत्रु लगा , पीछे हटने।
दोहरी चोट पड़ रही इसको,
व्यापार लगा है ,जो घटने ।

"गुरू जी" सीमा पर डटे वीर प्रहरी
और नभ में लड़ाकू विमान।
देश खड़ा है, सीना ताने,
मिटा देगें, इसका अभिमान।

कूटनीति "भारत" की देखो,
हुई शत्रु की घेराबंदी।
विस्तारवादी , इसकी नीति पुरानी ,
कर दो इसकी हदबंदी।

-- वीरेन्द्र कुमार
नई दिल्ली


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