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मेरे अल्फाज़

सौंदर्य वर्णन

Virender Singh

178 कविताएं

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उस रूप को मैंने देखा है
जिसका वर्णन मैं करता हूँ
नहीं मिटी आँखों से झलक है
ओ नमन तुझे मैं करता हूँ

गीत से मीठे बोल है उसके
मिश्री सी घुले है कानों में
मंदिर के भजनों सी मस्ती
स्वर लहरी मानों अजानों में

बोलों में खनक सी रहती है
नयनों में अदा सी बसती है
फ़िर क्यों ना कोई मोहित हो
वो स्वर्ग परी सी हस्ती है

चालों में मस्ती रहती है
छन-छन बजती है पायल
जब भी यहाँ से निकले है
हुआ ये घायल-हुआ वो घायल

लचक-लचक कर
फूलों की डाल सी
हर कदम है यों धरे
मंथर गति के ताल सी

तीव्र सुगन्ध फैला रही
सबके दिलों को भा रही
वो मदमदाती मस्त कन्या
कमर हिलाती आ रही

- विरेन्द्र सिंह

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