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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल

Vipul Artsian

15 कविताएं

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वो टुकड़ों टुकड़ों में हमको कर गए
हम थे तो खड़े वहीं पर बिख़र गए

कैसा है ये हुनर -ए- ज़क भी उनका
अपने दिल में ज़िंदा उनके दिल में मर गए

हँसते थे अपनी मोहब्बत में हम जिनपे
आज वही लोग हम पर ही हँसकर गए

जो मुसाफिर थे राह में फ़ना होने को
शाम ढलते ही सब -के- सब घर गए

खुला था दिल ये ख़िदमत में सबकी
जो आए वही हमको आज़माकर गए

ये मोहब्बत की राह तिरि नहीं 'नक़्श'
तू सबकी और सब तिरि आँखों से उतर गए


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