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मेरे अल्फाज़

बढ़ चल

Vipul Artsian

4 कविताएं

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क्यों डरता है तू बन्दे,
किसी दूसरे की सोच से
पगों को तू बढ़ाये जा,
ख़ुद की ही सूझ-बूझ से
उसने न सोचा पल भर,
तेरे लिए ये सोच के
तू क्यों उदास बैठा है,
उसकी आवारी सोच से
समाज-राज है कुछ नहीं,
अमावस्या की रात से
तू चल निकल आराम-से,
उस पूर्णिमा के चाँद-सा
आफ़ताब-सा तू चमकेगा,
ये जान ले तू आज से
जिंदगी है अनमोल-सी,
सुन तू ले ये ध्यान से
किसी से है तू कम नहीं,
ये रख तू कोई ग़म नहीं
इरादे तो फ़ौलादी हो,
जो हो अगर कुछ नहीं
किसी से न तू डरना,
सिवाए आगे चलना
ज्यूँ लगे तू परेशान से,
तो बात कर रहमान से


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