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मेरे अल्फाज़

तिरंगे में तीन रंग हैं

Vipin Dilwarya

128 कविताएं

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तिरंगे में तीन रंग हैं
सब रंग संग संग हैं
फिर काहे की जंग है

जात पात , ऊंच नीच
मज़हबों में खींचा तानी
एक दुसरे पर कसते व्यंग्य है

मैं हिन्दु तु मुसलमां
ये सिख वो इसाई इन
सब में बस इंसानियत तंग है

कोई गीता तो
कोई क़ुरान पढ़ता है
कोई गुरुग्रंथ तो
कोई बाईबल पढ़ता है

कोई मन्दिर तो
कोई मस्जिद जाता है
कोई गुरुद्वारा तो
कोई चर्च जाता है

कोई धूपबत्ती तो कोई
अगरबत्ती जलाता है
कोई सर को झुकाता है
तो कोई मोमबत्ती जलाता है

अलग रूप , अलग रंग है
इबादत सबकी एक है,
बस सबके अलग ढंग है

तिरंगे में तीन रंग है
सब रंग संग संग है
फिर काहे की जंग है

भेदभाव को दूर करो
अपने घमंड को चूर करो
हिंसा को त्यागो
अहिंसा के पुजारी बनो

जिसके अंदर एक नई उमंग है
जिसके अन्दर भाईचारे की तरंग है
वही इन्सान यहाँ मस्त मलंग है

हिन्दी हिन्दु हिंदुस्तान
सिख इसाई और
हिन्दु मुसलमान संग है
चारो मज़हब मेरे
देश के महत्वपूर्ण अंग है

तिरंगे में तीन रंग है
सब रंग संग संग है
फिर काहे की जंग है

- विपिन दिलवरिया ( मेरठ )

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