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मेरे अल्फाज़

छंद मुकरी (वसंत)

Vinod Rajak

22 कविताएं

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आना उसका मन हरसाए।
तन और मन दोनो को भाए।
मादक स्पर्श छुआ जैसे कंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

मंजरी से बदन सह्लाए।
मधुकर सा चुमे और गाए।
लगे उस घडी का ना हो अंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

ले आए सुर्ख टेसु के फूल।
संग उसके जाऊँ खुद को भुल।
अंक में भर के अधर काटे दंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

आ वेणी में सुमन सजाता ।
पयोधर उत्सेध कर जाता।
हो अंग-अंग अनंग अनंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

मदन भरे मन मंसिज मीता।
मन इस अनुरागी में रीता।
साथ न छोडुं पर समय बलवंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।


माननियों का दर्प मिटाए।
थके नहीं, हर वक्त थकाए।
अजमा कर देख, है ज्वलंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।


बदन बेसुध जो वो आए।
दर्प देख मयन, मन हीं मुस्काए।
सकेगा क्या उससे दिग दिगंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

नहीं जो मानुँ, वो रुठ जाए।
रुठुँ जो मैं तो वो घबराए।
ना सुनुं उसकी तो हो अंत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

पल पल पंचशर वो चलाए।
भरे मदन तन अगन जलाए।
नहीं बचे देव या हो संत।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

पुष्प पराग पटा हो कानन ।
उल्लसित शची सुरपुर आँगन।
मनोज, मेघपति कारण बने असन्त।
ए सखी! साजन? ना सखी, वसंत।

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